देखो ये देव धरा है जहां आए स्वयं भगवान है
ये धरा प्रभु राम कृष्ण बुद्ध महावीर नानक कबीर और अनेक सिद्ध अवधूत संतो के वास्तविक जीवंत चरित्र लीला की साक्षी रही है और आज भी है, ये देव भूमि भारत समूचे भूमंडल में सत्य सनातन धर्म की जीवंत मिशाल रहा है।
सावधान करती एक अवधूत की निर्विकार समर्थ वाणी
यदि समय रहते सत्य पर ध्यान केंद्रित नही हुआ और सत्य को लक्ष्य नही बना पाए तो ध्यान रखना तुम्हारा ही काम क्रोध लोभ मोह अहंकार तुम्हें अपना लक्ष्य बना लेगा और तुम्हें खत्म कर देगा।
दादागुरु भगवान हमेशा एक ही बात कहते है देखो अभी समय रहते जागो उठो चलो सत्य को जानो, वास्तविक सात्विक जीवन जियो।
१) दुनिया जिसे नदी कहती है वो मां नर्मदा हमारे लिए साक्षात भगवती है ,महाशक्ति है ये वो शक्ति है जिसने तीर्थों को प्रकट किया और तीर्थंकरों को आश्रय दिया ।ये वो जगतजननी है जिसकी गुरु गोविंद वन्दना करते है।ये सर्व तीर्थों की नायक है।
२) प्रलय और महाप्रलय में भी जिसका अंत नही हो सकता वो महाशक्ति नर्मदा है ।
३) प्रलय और महाप्रलय में यह आदिशक्ति जीवजगत और ब्रह्मांड को धारण करती है फिर महाप्रलय व प्रलय के बाद पुनः उसे प्रगट करती है।
४)नर्मदा माँ की परिक्रमा एक सहज योग है यदि खुद से मिलना हो या परमात्मा का साक्षात्कार करना हो तो परिक्रमा ही एकमात्र उपाय है।परिक्रमा जीवन को दिशा देती है परिक्रमा जीना सिखाती है। ये मूल आधार शक्ति से जोड़ती है तथा चक्रों का समन्वय व सन्तुलन कराती है।
५)हमारे जीवन का जो सत्य है वो माँ नर्मदा है नर्मदा ही सत्य है और तुम सत्य का दर्शन करते हो।
६)सत्य से ही जीवन चला और धर्म चला इसलिए हमें सत्य का स्मरण करना है।
७) सुख शांति समृद्धि की बात हो तो माँ ने गऊ का रूप धारण किया बात पालन पोषण की आये तो धरती का रूप धारण किया और यदि बात जीवन की आए तो वो नदी का रूप धारण करती है जन्म देने वाली भी माँ है , जीवन देने वाली भी मां है पालन पोषण करने वाली भी माँ है एक माँ ही है जो जीना सिखाती है।
८)सन्त का क्षण,अन्न का कण, गंगा नर्मदा के जल की एक बूंद भी यदि मिल रही हो तो उसे व्यर्थ मत गवांना कभी व्यर्थ नहीं करना क्योंकि न जाने किस क्षण में किस कण में जल की किस बून्द में तुम्हारा उद्धार छिपा हो।यही तुम्हारे उद्धार का मार्ग है।
९)गुरु गोविंद का चरित्र जीवन्त प्रामाणिकता है कि सबसे बेहतर जीवन माँ ने दिया है माँ नर्मदा के पथ पर चलना साधना हो जाती है और बैठना उपासना हो जाती है इतनी सहजता कहीं और मिलना असम्भव है। ये वो महाशक्ति है जिसकी गुरु व गोविंद स्तुति करते है।
१०) प्रलय और महाप्रलय में भी जिसका अंत नही हो सकता वो महाशक्ति नर्मदा है ।
११) प्रलय और महाप्रलय में यह आदिशक्ति जीवजगत और ब्रह्मांड को धारण करती है फिर महाप्रलय व प्रलय के बाद पुनः उसे प्रगट करती है।
१२)दुनिया जिसे नदी कहती है वो मां नर्मदा हमारे लिए साक्षात भगवती है ,महाशक्ति है ये वो शक्ति है जिसने तीर्थों को प्रकट किया और तीर्थंकरों को आश्रय दिया ।ये वो जगतजननी है जिसकी गुरु गोविंद वन्दना करते है।ये सर्व तीर्थों की नायक है।
१५)सत्य से ही जीवन चला और धर्म चला इसलिए हमें सत्य का स्मरण करना है।
देखो ये देव धरा है जहां आए स्वयं भगवान है
ये धरा प्रभु राम कृष्ण बुद्ध महावीर नानक कबीर और अनेक सिद्ध अवधूत संतो के वास्तविक जीवंत चरित्र लीला की साक्षी रही है और आज भी है, ये देव भूमि भारत समूचे भूमंडल में सत्य सनातन धर्म की जीवंत मिशाल रहा है।
सावधान करती एक अवधूत की निर्विकार समर्थ वाणी
यदि समय रहते सत्य पर ध्यान केंद्रित नही हुआ और सत्य को लक्ष्य नही बना पाए तो ध्यान रखना तुम्हारा ही काम क्रोध लोभ मोह अहंकार तुम्हें अपना लक्ष्य बना लेगा और तुम्हें खत्म कर देगा।
दादागुरु भगवान हमेशा एक ही बात कहते है देखो अभी समय रहते जागो उठो चलो सत्य को जानो, वास्तविक सात्विक जीवन जियो।
१) दुनिया जिसे नदी कहती है वो मां नर्मदा हमारे लिए साक्षात भगवती है ,महाशक्ति है ये वो शक्ति है जिसने तीर्थों को प्रकट किया और तीर्थंकरों को आश्रय दिया ।ये वो जगतजननी है जिसकी गुरु गोविंद वन्दना करते है।ये सर्व तीर्थों की नायक है।
२) प्रलय और महाप्रलय में भी जिसका अंत नही हो सकता वो महाशक्ति नर्मदा है ।
३) प्रलय और महाप्रलय में यह आदिशक्ति जीवजगत और ब्रह्मांड को धारण करती है फिर महाप्रलय व प्रलय के बाद पुनः उसे प्रगट करती है।
४)नर्मदा माँ की परिक्रमा एक सहज योग है यदि खुद से मिलना हो या परमात्मा का साक्षात्कार करना हो तो परिक्रमा ही एकमात्र उपाय है।परिक्रमा जीवन को दिशा देती है परिक्रमा जीना सिखाती है। ये मूल आधार शक्ति से जोड़ती है तथा चक्रों का समन्वय व सन्तुलन कराती है।
५)हमारे जीवन का जो सत्य है वो माँ नर्मदा है नर्मदा ही सत्य है और तुम सत्य का दर्शन करते हो।
६)सत्य से ही जीवन चला और धर्म चला इसलिए हमें सत्य का स्मरण करना है।
७) सुख शांति समृद्धि की बात हो तो माँ ने गऊ का रूप धारण किया बात पालन पोषण की आये तो धरती का रूप धारण किया और यदि बात जीवन की आए तो वो नदी का रूप धारण करती है जन्म देने वाली भी माँ है , जीवन देने वाली भी मां है पालन पोषण करने वाली भी माँ है एक माँ ही है जो जीना सिखाती है।
८)सन्त का क्षण,अन्न का कण, गंगा नर्मदा के जल की एक बूंद भी यदि मिल रही हो तो उसे व्यर्थ मत गवांना कभी व्यर्थ नहीं करना क्योंकि न जाने किस क्षण में किस कण में जल की किस बून्द में तुम्हारा उद्धार छिपा हो।यही तुम्हारे उद्धार का मार्ग है।
९)गुरु गोविंद का चरित्र जीवन्त प्रामाणिकता है कि सबसे बेहतर जीवन माँ ने दिया है माँ नर्मदा के पथ पर चलना साधना हो जाती है और बैठना उपासना हो जाती है इतनी सहजता कहीं और मिलना असम्भव है। ये वो महाशक्ति है जिसकी गुरु व गोविंद स्तुति करते है।
१०) प्रलय और महाप्रलय में भी जिसका अंत नही हो सकता वो महाशक्ति नर्मदा है ।
११) प्रलय और महाप्रलय में यह आदिशक्ति जीवजगत और ब्रह्मांड को धारण करती है फिर महाप्रलय व प्रलय के बाद पुनः उसे प्रगट करती है।
१२)दुनिया जिसे नदी कहती है वो मां नर्मदा हमारे लिए साक्षात भगवती है ,महाशक्ति है ये वो शक्ति है जिसने तीर्थों को प्रकट किया और तीर्थंकरों को आश्रय दिया ।ये वो जगतजननी है जिसकी गुरु गोविंद वन्दना करते है।ये सर्व तीर्थों की नायक है।
१५)सत्य से ही जीवन चला और धर्म चला इसलिए हमें सत्य का स्मरण करना है।
ना चर्चा ना पर्चा सत्य केवल एक ही कर्ता..दादागुरु
सनातन धर्म की पहचान कर्ता से है,चर्चा-पर्चा से नही
देखो ये देव धरा है जहां आए स्वयं भगवान है
ये धरा प्रभु राम कृष्ण बुद्ध महावीर नानक कबीर और अनेक सिद्ध अवधूत संतो के वास्तविक जीवंत चरित्र लीला की साक्षी रही है और आज भी है, ये देव भूमि भारत समूचे भूमंडल में सत्य सनातन धर्म की जीवंत मिशाल रहा है।
हमारी सनातन संस्कृति एक धर्म ,एक धरा, एक विश्व ,एक परिवार की हमेशा पक्षधर रही है और आज भी है, विश्व कल्याण की भावना से ओतप्रोत आइए वास्तविक सात्विक निर्विकार सत्य की ओर कदम बढ़ाएं एक अवधूत के महाव्रत साधना में छिपे संदेश को आत्मसात करें सत्य सनातन धर्म की स्थापना में अपना योगदान सुनिश्चित करें ..
जो कर्म योगी है,जो निष्काम भक्त प्रेमी है जो वास्तविक जीवन जी रहा है और प्रपंच आडंबर से मुक्त है उसके लिए ये दादागुरु के बोल अमृत तुल्य संजीवनी है पर जो अहंकारी है अज्ञानी है जो केवल वक्ता है, कामी है भोगी है उसके लिए बहुत कड़वे तेज तीखे साबित होंगे है।
आपत्ती विपत्ति का कारण व्यक्ति की प्रवृत्ति है..प्रकृति नही,सत्य की ओर चले सत्य की अनदेखी मत करें..
सत्य जीवंत है प्रत्यक्ष है सत्य ही जीव जगत का आधार है
वास्तविक सात्विक जीवन अपनाएं यही दादागुरु भगवान का निर्विकार भाव है..जो जाने सो पाए…
इन सात मानस पुष्पों से शिव उपासना करें..
सत्य,अहिंसा,दया,क्षमा, तप,ध्यान और ज्ञान ये मानस पुष्प है।
साक्षात शिव स्वरूप हैं गुरु शंकर स्वरूप इन वृक्ष वनस्पतियां,पेड़ पौधों का पूजन करें शिव की सगुण उपासना करें देववृक्ष मूर्तियों की स्थापना करें।
शिव शक्ति का प्रत्यक्ष प्रतीक हैं शिव लिंग जो ब्रह्मांड का भी प्रतीक है शिवलिंग का ध्यान साधना व अभिषेक करें..
दादागुरु भगवान हमेशा कहते है
सत्य ही शिव है, तत्व है,सनातन है ,शाश्वत है ,व्यापक है,आदि है,अनंत है ,अस्तित्व है,ज्ञान है, आनंद है ,शांति है,कल्याण है ।
शंकर को गुरु स्वरूप कर्ता जानो और शिव लिंग को शिव शक्ति का और ब्रह्मांड का प्रत्यक्ष प्रतीक मानो…
एक मां की दूजी गुरु गोविंद की नज़र से..
ना कुछ छिपा है ,ना तुम छिपाओ…दादागुरु भगवान
जो तुमने छिपाया या छिपा है वही तुम्हारे दुःख परेशानियों का कारण हमेशा बना है।
एक निष्काम कर्मयोगी अवधूत या समर्थ गुरु से छिपा कर किया गया जप,तप,सेवा,ध्यान, साधना,सत्कर्म सब व्यर्थ हो जाते है।
हमेशा ध्यान रखना गुरु आज्ञा और उनके मार्गदर्शन सानिध्य में किया गया प्रत्येक छोटा बड़ा सेवा कार्य हो या ध्यान साधना व्यक्ति को सफलता प्रसन्नता के उच्च शिखर पर पहुंचाने में सक्षम होती है।
कड़वा है पर सत्य है
गुरु से विमुख होकर नही,गुरु के सन्मुख रह कर ही परम लक्ष्य को पाया जा सकता है..
ध्यान रहे साधक की साधना में सबसे बड़ा बाधक अहंकार है।
काम क्रोध लोभ मोह बुद्धि से ग्रसित मन है।
यदि जीवन में कुछ पाने की चाह हो या अपने जीवन को सबसे बेहतर बनाने या कुछ करने की चाह हो तो केवल सदगुरु को तुम अपना अहम( मैं)और मन समर्पित करके देखो …
फिर देखो…
एक मां की दूजी गुरु गोविंद की नज़र से..
ना कुछ छिपा है ,ना तुम छिपाओ…दादागुरु भगवान
यदि जीवन में कुछ पाने की चाह हो या अपने जीवन को सबसे बेहतर बनाने या कुछ करने की चाह हो तो केवल सदगुरु को तुम अपना अहम( मैं)और मन समर्पित करके देखो …
फिर देखो…
मैं न तुझे आस्तिक बनाता हूं न नास्तिक बनाता हूं.
मैं तो तुझे वास्त्विक जीना सिखाताहूं और सात्विक रहना बताता हुं –