वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम
प्राकृतिक ट्रीटमेन्टप्लान्ट के माध्यम से अनेक तटों पर जल शुद्धिकरण की दिशा में एक अनूठी पहल।
पंचकोशी यात्रा
स्थानीय परम्पराओं पर आधारित पंचकोशी परिक्रमाए माता नर्मदा जल शुद्धिकरण व संरक्षण एवम जन- जागरूकता लाने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई है।
समर्थ पालना घरों (नर्सरी) की विविध प्रदेशों में जिलेवार स्थापना
प्रकृति संरक्षण संवर्धन की दिशा में कार्य करते हुए नर्मदा मिशन द्वारा दादागुरु के मार्गदर्शन में जिलेवार समर्थ पालना घरों की स्थापना की गई है । जिसका उद्देश्य मूल वृक्षों के बीजों से पौधों को तैयार करना है चूंकि आज मूल वृक्षों के बीजों की उपलब्धता नगण्य होती जा रही है संकर बीजों में गुणवत्ता में कमी देखी जाती है अतः वृक्षारोपण में अधिक से अधिक मूल वृक्षों का ही रोपण हो इस लक्ष्य के साथ साथ कम मूल्य में पौधा उपलब्ध कराना भी नर्मदा मिशन का एक उद्देश्य है। जिससे हर एक वर्ग का सदस्य वृक्षारोपण में अपनी सहभागिता ज्यादा से ज्यादा दे सके और पौधों को स्थापित कर संरक्षित कर सके।इसके अलावा विभिन्न जनपदों के प्रत्येक ग्राम में समर्थ पंचवटी (पांच देववृक्ष) की स्थापना भी की गई है जो आगे भी जारी रहेगी। सम्पूर्ण नर्मदा पथ को हरा भरा करने तथा वसुधा को हरित चूनर ओढ़ाने के साथ साथ रोजगार के अवसर भी प्रदान करना है।
इस सदी की सबसे बड़ी मुहिम
3200 कि.मी. निराहार माँ नर्मदा सेवा परिक्रमा
ना भुतो ना भविष्यति-द्वितीयो ना अस्ति ना कोई है.ना कोई होगा, दादागुरु के जैसा।
1100 से अधिक दिनो से चल रहा विश्व का सबसे बड़ा निराहार सत्याग्रह… दादा गुरू (धुनी वाले) को अखण्ड साधना के असाधारण अकल्पनीय पैदल 3200 कि.मी. नर्मदा परिक्रमा के प्रथम चरण पूर्ण द्वितीय चरण 27 नबम्बर 2023 से ओम्कारेश्वर से पुनः प्रारम्भ।
पातालकोट जो कि 3000 फीट की गहराई में अपने 12 गांव लेकर खड़ा हुआ है जहाँ आज भी अन्य जगहों की तुलना में विशुद्ध रूप में प्रकृति विद्यमान है एवम हज़ारों प्रकार की औषधीय जड़ी बूटियों का भंडार है । एक समय था जब सूरज की रोशनी भी यहाँ नहीं पहुंच पाती थी किन्तु आज दृश्य अलग है पातालकोट मानवीय लालसाओं की भेंट चढ़ता जा रहा रहा है यहाँ की वन संपदा नष्ट हो रही है जड़ी बूटियां नष्ट हो रही है ,प्राकृतिक खेती करने वाले वन आदिवासी केमिकल युक्त कृषि कर रहे है। नतीजा पहाड़ दरक रहे हैं वन सम्पदा नष्ट हो रही है अतः वन संरक्षण सम्वर्धन करने व आदिवासियों का अन्यत्र पलायन रोकने के उद्देश्य से पहले तो दादागुरु ने एक पातालकोट महोत्सव का आयोजन किया जिसमें देश विदेश के एक लाख लोग शामिल हुए ततपश्चात दादागुरु ने अपना चातुर्मास पातालकोट में किया तथा प्रकृति संरक्षण सम्वर्धन के लिए यहाँ अनेकों उल्लेखनीय कार्य आरम्भ किये। जैसे नर्मदा मिशन ने दादागुरु के सानिध्य व मार्गदर्शन में सर्वप्रथम 2 लाख पौधों को रोपित किया एवम उनकी रक्षा सुरक्षा के लिए कार्य योजना बनाई इसके साथ साथ पातालकोट में पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की घास जो मिट्टी को मजबूती से पकड़ती है के बीजों का रोपण हरेक पहाड़ी एवम मैदानी जगहों पर किया गया। जिससे मिट्टी के क्षरण को रोका जा सके इसके अलावा पालनाघर (नर्सरी)की स्थापना की गयी जिसमे मूल पेड़ों के बीजों से ही पौधों को तैयार किया गया इसमें लोगों को गांव में ही रोज़गार भी मिला। औषधीय जड़ी बूटियों का संरक्षण सम्वर्धन भी सफलतापूर्वक किया गया।
सीता रेवा, दूधी इत्यादि सहायक नदियों को संरक्षित करने के लिए विविध माध्यमों का प्रयोग किया गया जिसमें दादागुरु के आह्वान पर स्थानीय जनसमुदाय ने अपनी सहभागिता निभाई ।लोग जो धीरे धीरे वनों से दूर हो रहे थे पुनः प्रकृति की औऱ लौटे ओर आज पातालकोट दादागुरु का ऋणी है कि समय रहते स्थानीय रहवासियों में इतनी जाग्रति तो आ ही गयी कि किसी भी प्रलोभन में आकर वे अपनी वन संपदा को नष्ट नहीं करेंगे। इसके साथ ही बकस्वाहा जंगल, नर्मदा का रायपेरियन ज़ोन, अमरकण्टक की औषधीय वन संपदा आदि के संरक्षण सम्वर्धन के लिए नर्मदा मिशन दादागुरु के सानिध्य औऱ मार्गदर्शन में कार्य कर रहा है।
शक्ति की की सगुन उपासना में पांच माता का पूजन पँचमूर्तियों के रूप में दादा गुरु ने आरंभ करवाया है। यह पांच माताएं हैं ।
1) जननी (जन्म देने वाली माँ) 2) जीवन दायिनी ( पालने वाली पवित्र नदियाँ ) 3) धेनु 4) धरा 5)राष्ट्रमाता
इन पांचो माताओं पर ही हमारा जीवन आधारित है इसी प्रकार नवरात्रि के पावन पर्व पर भी दादा गुरु ने सगुण उपासना को शक्ति की आराधना का आधार बनाया अर्थात वनस्पतियों में छिपी दैवीय ऊर्जा का परिचय दादा गुरु ने करवाया तथा उनका स्वरूप भी बतलाया जैसे प्रथम शैलपुत्री यानी हरड़, द्वितीय ब्रह्मचारिणी अर्थात ब्राह्मी ,तृतीय चंद्रघंटा अर्थात चंद्रसुर, चतुर्थ कूष्मांडा यानी पेठा ,पंचम स्कंध माता अर्थात अलसी, षष्टम कात्यायनी अर्थात मोईया ,सप्तम कालरात्रि यानी नागदोन ,अष्टम महागौरी यानी तुलसी ,नवम सिद्धिदात्री यानी शतावरी । मार्कंडेय पुराण के अनुसार नव देवी इन नो औषधीय के रूप में प्रकृति में उपस्थित है इसलिए नवदुर्गा उत्सव में दादा गुरु ने प्रकृति पूजा को श्रेष्ठ मानते हुए मां की आराधना उपासना के साथ इन औषधीय पौधों की स्थापना करके पूजन करने की नवीन शुरुआत करके समाज को प्रकृति उपासना से जोड़ा है।