इन पांचो माताओं पर ही हमारा जीवन आधारित है इसी प्रकार नवरात्रि के पावन पर्व पर भी दादा गुरु ने
सगुण उपासना को शक्ति की आराधना का आधार बनाया अर्थात वनस्पतियों में छिपी दैवीय ऊर्जा का
परिचय दादा गुरु ने करवाया तथा उनका स्वरूप भी बतलाया जैसे प्रथम शैलपुत्री यानी हरड़, द्वितीय
ब्रह्मचारिणी अर्थात ब्राह्मी ,तृतीय चंद्रघंटा अर्थात चंद्रसुर, चतुर्थ कूष्मांडा यानी पेठा ,पंचम स्कंध माता
अर्थात अलसी, षष्टम कात्यायनी अर्थात मोईया ,सप्तम कालरात्रि यानी नागदोन ,अष्टम महागौरी यानी
तुलसी ,नवम सिद्धिदात्री यानी शतावरी ।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार नव देवी इन नो औषधीय के रूप में प्रकृति में उपस्थित है इसलिए नवदुर्गा उत्सव
में दादा गुरु ने प्रकृति पूजा को श्रेष्ठ मानते हुए मां की आराधना उपासना के साथ इन औषधीय पौधों की
स्थापना करके पूजन करने की नवीन शुरुआत करके समाज को प्रकृति उपासना से जोड़ा है।